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कमलनाथ सरकार की चाल-ढाल बदल जाने के मायने

Kamalnath government changed style

 

मप्र में कांग्रेस 15 सालों बाद सत्‍ता में आई और इस बार ‘सरकार’ की चाल-ढाल में पिछली सरकारों से काफी अंतर नजर आ रहा है. दिल्‍ली में की गई मशक्‍कत के बाद कमलनाथ मंत्रिमंडल में तमाम गुटीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक समीकरणों को साध लिया गया. कुछ नाराजगियों को खत्‍म करने के उपक्रम भी किए गए हैं. मगर, कमलनाथ कैबिनेट पर गौर किया जाए तो नई राजनीतिक संस्कृति की ओर संकेत करतीं कुछ विशेषताएं रेखांकित होती हैं.

मप्र के साथ छत्‍तीसगढ़ में नवाचार करते हुए कांग्रेस ने किसी को भी राज्‍यमंत्री नहीं बनाया है. कैबिनेट और राज्‍यमंत्री का अंतर नहीं रखने का अर्थ है, सभी का कद बराबर तो जिम्‍मेदारी भी बराबर. यह जिम्‍मेदारी कांग्रेस के वचन पत्र को पूरा करने की ही नहीं है बल्कि मिशन 2019 के प्रति भी है. ‘टीमवर्क’ ऐसा हो कि आम चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेमिसाल हो सके.

असल में, अब तक की सभी सरकारों में सामान्‍य तौर पर राज्‍यमंत्रियों की यह शिकायत होती थी कि उनके पास काम नहीं है. वे या तो विधानसभा के प्रश्‍नों और ध्‍यानाकर्षण सूचनाओं के जवाब देने का काम करते या दफ्तरी काम निपटाते थे. इससे उन्‍हें पॉलीटिकल माइलेज नहीं मिलता था. अनुशंसा से काम न होने पर समर्थकों के नाराज होने का खामियाजा अलग. नाथ मंत्रिमंडल के सदस्‍यों को इस भेद से मुक्ति मिली है. विभाग में चाहे जो हो, काम का मौका तो मिलेगा ही.

कमलनाथ मंत्रिमंडल में तमाम गुटीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक समीकरणों को साध लिया गया. कुछ नाराजगियों को खत्‍म करने के उपक्रम भी किए गए हैं. मगर, इस सबसे अलग कमलनाथ कैबिनेट पर गौर किया जाए तो नाथ ने अपनी टीम का चेहरा ‘युवा’ ही रखा है. कमलनाथ कैबिनेट की औसत आयु 53 साल है.

दो मंत्री जयवर्धन और सचिन यादव चालीस साल से कम उम्र के हैं. कमलनाथ समेत 9 मंत्री ऐसे जिनकी उम्र 60 साल से ज्यादा है. वह कमलनाथ सरकार के सबसे कम उम्र के मंत्री हैं. जयवर्धन सिंह के अलावा सुरेंद्र सिंह की उम्र 41 साल, लगातार दूसरी बार विधायक बने सचिन यादव की उम्र 36 साल, प्रियव्रत सिंह की 40 साल है. 43 साल की इमरती देवी के अलावा 44 साल के उमंग सिंघार, 45 साल के जीतू पटवारी भी मंत्री बनाए गए हैं.

कमलनाथ के कैबिनेट को युवा बनाने की एक वजह प्रदेश के युवाओं का साथ पाने की आस है. प्रदेश में 1.5 करोड़ युवा मतदाता हैं जिन्होंने पिछले 15 साल से सिर्फ भाजपा का शासन देखा है. युवाओं के बीच अपनी पैठ के कारण ही भाजपा ने बीते दो दशकों में मध्य प्रदेश में अपनी ताकत बढ़ाई है. आमतौर पर यह धारणा है कि युवा वर्ग कांग्रेस से दूर है.

2019 का चुनाव और कांग्रेस की ताकत यह युवा वर्ग है और उन्हें साधने के लिए कमलनाथ ने अपना मिशन शुरू कर दिया है. शपथ ग्रहण के बाद मीडिया से चर्चा में प्रदेश के युवाओं को रोजगार देने के बारे में आया उनका विवादित बयान इसी कड़ी का एक हिस्‍सा कहा जा सकता है.

चुनाव के दौरान भी कांग्रेस की इन डेढ़ करोड़ युवाओं पर खास नजर थी. इसी कारण पार्टी ने अपने वचनपत्र में बेरोजगारी भत्ता और रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया क्योंकि शिवराज सरकार की 12 से ज्यादा योजनाएं युवाओं पर ही केंद्रित थीं. वह लैपटॉप-मोबाइल वितरण के साथ कॉलेज फीस भी दे रही थी. मगर, रोजगार के मामले में शिवराज सरकार को अधिक सफलता नहीं मिली थी. सरकारी तौर पर दावा किया किया गया कि भाजपा सरकार 3 लाख युवाओं को रोजगार दिलवा चुके हैं.

मगर 2017 में आई एनसीआरबी की रिपोर्ट 2015 तक मध्य प्रदेश में रोजगार की स्थिति पर निराशाजनक जानकारी देती है. यहां बेरोजगारी के कारण आत्महत्या करने वालों का आंकड़ा पांच शीर्ष राज्यों में शुमार है.नई सरकारी नौकरियों में एक तरह से तालाबंदी करती आई शिवराज सरकार ने लगातार निवेश समिट तो करवाईं, लेकिन मध्य प्रदेश का औद्योगिक विकास गति नहीं पकड़ पाया. लिहाजा, कमलनाथ ‘युवा टीम’ साथ लेकर युवाओं को लुभाने का जतन करेंगे.