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नव-उदारवाद की आग में जलता फ्रांस

effect of neo liberal economical policy in france

 

फ्रांस में जन-विद्रोह की लहरों का एक सिलसिला चल रहा है. 17 नवंबर को लोग सड़कों पर तब उतरे, जब फ्रांस में ईंधन के दामों में 23 प्रतिशत वृद्धि की गई. लेकिन, यह एक तात्कालिक कारण था और जो लोगों के बीच पनप रहे असंतोष और आक्रोश के विस्फोट का कारण बना. लेकिन, असल कारण ज्यादा व्यापक और गहरे हैं. इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि फ्रांस की सरकार ने एक दिसंबर के प्रदर्शन के बाद ईंधन के करों में की गई वृद्धि को वापस ले लिया, लेकिन उसके बावजूद भी लोग आठ दिसंबर को लाखों की संख्या में सड़कों पर उतरे. इस पूरे संदर्भ में प्रश्न यह है कि आखिर फ्रांस की करीब दो-तिहाई जनता में इतना असंतोष और आक्रोश क्यों है? क्यों जनविद्रोह की लहर पर लहर उठ रही है और शांत होने का नाम नहीं ले रही है?

पूरी दुनिया की तरह फ्रांस में भी नव-उदारवादी पूंजीवादी नीतियों ने अमीर और गरीब लोगों की बीच की खाई को बहुत चौड़ा कर दिया है. ऊपर के 20 प्रतिशत लोग नीचे के 20 प्रतिशत लोगों की तुलना में पांच गुना अधिक आय प्राप्त कर रहे हैं. ऊपर के एक प्रतिशत लोगों के हाथ में 20 प्रतिशत से अधिक आर्थिक संपदा है. फ्रांस की प्रति व्यक्ति औसत राष्ट्रीय आय 42,567.74 अमेरिकी डॉलर है, जबकि आधे से अधिक फ्रांसीसी लोगों की औसत मासिक आय 1,930 अमेरिकी डॉलर से भी कम है. फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी का आकलन बताता है कि फ्रांस के निम्न और मध्य वर्ग की औसत आय स्थिर है या एक प्रतिशत या इससे कम दर से बढ़ रही है, जबकि धनी और धनी होते जा रहे हैं, उनकी आय में करीब तीन प्रतिशत वार्षिक की वृद्धि हो रही है.

फ्रांस की आर्थिक विकास दर 1.8 प्रतिशत है. इसने हालात को और बदतर बना दिया है. इस धीमी विकास दर से सृजित होने वाली आय का बड़ा हिस्सा कार्पोरेट और अमीरों के हाथ में चला जा रहा है. यूरोपीय यूनियन के 2012 के ऋण संकट के बाद फ्रांस की अर्थव्यवस्था की विकास दर स्थिर है. फ्रांस के एक बड़े हिस्से के पास काम नहीं है. 2009 लेकर अब तक फ्रांस में बेराजोगारी की दर 9 से 11 प्रतिशत बनी हुई है. इस समय फ्रांस में 9.1 प्रतिशत लोग बेरोजगार हैं. यह संख्या जर्मनी की तुलना में दोगुनी है.

प्रदर्शनकारी फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रोन को अमीरों का राजा कहकर पुकार रहे हैं. फ्रांस के राष्ट्रपति चुने जाने के पहले ही वर्ष में उन्होंने अमीरों पर लगने वाले करों में 3.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर की कटौती की. इससे फ्रांस की सरकार को होने वाली एक वर्ष की आय में 3.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर की कमी आ गई. सबसे ज्यादा कटौती संपत्ति कर और पूंजी आय में की गई. अमीरों की टैक्स में यह भारी छूट लोगों के आक्रोश की एक बड़ी वजह है. एक तरफ कार्पोरेट और अमीरों को इतने बड़े पैमाने पर कर में छूट दी गई, दूसरी तरफ फ्रांस के आर्थिक सर्वे के अनुसार, इस वर्ष फ्रांस के 70 प्रतिशत लोगों की आय में कोई वृद्धि नहीं हुई. नीचे के पांच प्रतिशत लोगों की क्रय शक्ति और गिर गई.

यूरोपीय यूनियन के 28 देशों में फ्रांस के श्रमिक सबसे ज्यादा टैक्स चुकाते हैं. इस समय फ्रांस में ज्यादातर वस्तुओं और सेवाओं पर 20 प्रतिशत टैक्स लगता है. इस टैक्स की मार भी श्रमिकों, निम्न-मध्य वर्ग और मध्य वर्ग पर पड़ती है. फ्रांस की सरकार ने 2019 का जो बजट अक्टूबर 2018 में प्रस्तुत किया. उसमें वेतन में 18.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर की कटौती का प्रस्ताव भी शामिल था. इसके साथ ही कारोबारियों को लोगों को नौकरी पर रखने और निवेश के नाम पर व्यापार कर में कटौती का प्रस्ताव किया गया.

फ्रांस दुनिया के उन चंद देशों में शामिल है, जहां सामाजिक सुरक्षा तंत्र सबसे बेहतर और मजबूत है. यहां आर्थिक आय का एक-तिहाई हिस्सा नागरिकों के कल्याण पर खर्च होता है, जो यूरोप के किसी भी देश की तुलना में सबसे ज्यादा है. 2016 में फ्रांस ने करीब 715 बिलियन अमेरिकी डॉलर स्वास्थ्य, परिवारों की सहायता, बेरोजागारी भत्ता और व्यापक जनता के फायदे के दूसरे मदों में खर्च किया था. देशी-विदेशी कार्पोरेट घरानों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों का दबाव है कि इसमें बड़े पैमाने पर कटौती की जाए. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से इसकी शुरुआत भी कर दी गई है, जिससे लोगों में गहरा आक्रोश है.

फ्रांस में श्रम कानून यूरोप-अमेरिका की तुलना में श्रमिकों को ज्यादा सुरक्षा मुहैया कराते हैं. राष्ट्रपति मैक्रोन लगातार कह रहे हैं कि फ्रांसीसी अर्थव्यवस्था की विकास की रफ्तार तेज करने के लिए जरूरी है कि फ्रांस की श्रम संहिता में तेजी से बदलाव लाया जाए. निवेशकों यानी रोजगार प्रदाताओं को हायर एंड फायर की छूट दी जाए. उन बाधाओं को दूर किया जाए, जिनके चलते निवेशक पुराने श्रमिकों को निकालकर नए श्रमिकों की भर्ती नहीं कर पाते. कमर्चारी संघों के अधिकारों में कटौती का भी प्रस्ताव है, क्योंकि वर्तमान नियमों के तहत एक कर्मचारी से समझौता करके कोई नियोक्ता किसी कर्मचारी को निकाल या रख नहीं सकता है. रखने और निकालने की शर्तें यूनियन और नियोक्ता के बीच सामूहिक समझौते के तहत तय होती हैं.

मानवीय गरिमा के साथ जीने के लिए न्यूनतम आवश्यक आय में कमी, बेरोजगारी, अमीरों और गरीबों के बीच असमानता की चौड़ी होती खाई, कॉरपोरेट और अमीरों के करों में भारी कटौती, निम्न-मध्य वर्ग और मध्य वर्ग पर करो का बढ़ता बोझ, सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सामाजिक सुरक्षा में कटौती का प्रस्ताव और श्रम कानूनों को नियोक्ताओं के अनुकूल बनाने का प्रस्ताव वे बुनियादी वजहें हैं, जिनके चलते फ्रांस की 70 प्रतिशत से अधिक जनता के भीतर गहरा असंतोष और आक्रोश है, जो विभिन्न रूपों में सड़कों पर फूट रहा है. यह सभी कुछ विश्वव्यापी नव-उदारवादी पूंजीवादी नीतियों का परिणाम है, जिसे मैक्रोन भी फ्रांसीसी समाज में तथाकथित क्रांतिकारी परिवर्तन की जरूरत के नाम पर लागू करने की कोशिश कर रहे हैं. पहले की सरकारें भी यही करती रही हैं.

फ्रांस की जनता के भीतर असंतोष और आक्रोश वर्षों से पनप रहा था. यह परंपरागत राजनीतिक पार्टियों से मोह भंग के रूप में सामने आया. इसी मोह भंग के चलते लोगों ने 18 महीने पहले ही एक कमोबेश गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति (बैंकर) मैक्रोन को अपना राष्ट्रपति चुना था, जिसने लोगों की जीवन स्थिति में सुधार करने और सबको रोजगार मुहैया कराने का वादा किया था. उन्होंने फ्रांसीसी लोगों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन का वादा किया था.

संसदीय चुनावों में भी लोगों ने परंपरागत पार्टियों को दरकिनार कर मैक्रोन की नई-नवेली पार्टी को समर्थन दिया था. लेकिन, सत्ता में आने के साथ ही मैक्रोन ने नव-उदारवादी पूंजीवादी नीतियों को और जोर-शोर से लागू करना शुरू कर दिया. जिसका परिणाम व्यापक पैमाने पर असंतोष के रूप में सामने आया है. जिन लोगों ने मैक्रोन को समर्थन दिया था, उनमें से 50 प्रतिशत लोग आज उनके खिलाफ हैं. लोग कह रहे हैं कि सरकार धनी लोगों के लिए काम कर रही है. प्रर्दशनकारी कह रहे हैं- मैक्रोन हट जाओ, रास्ता साफ करो. क्रांति की भी बातें हो रही हैं.

ऐसा नहीं है कि ये नव-उदारवादी नीतियां केवल फ्रांस में लागू हो रही हैं और उसके बदतर परिणाम सिर्फ फ्रांस की जनता को भुगतने पड़ रहे हैं. यह विश्वव्यापी परिघटना है, लेकिन फ्रांस दुनिया में एक मामले में अपने तरह का अलग देश है. यहां लोगों में मानवीय गरिमा के साथ जीने की चेतना सापेक्षिक तौर बहुच उंचे स्तर की है. यहां क्रांतिकारी परिवर्तन की सतत परंपरा रही है. 1789 की क्रांति ने सामंतवाद को ध्वस्त किया, तो 1871 की क्रांति ने पूंजीवाद को थोड़े समय के लिए ही सही, ध्वस्त कर दिया और मेहनतकशों का शासन कायम किया.

1968 में फ्रांसीसी छात्रों के विद्रोह ने दुनिया भर पर असर डाला. नव-उदारवादी नीतियों के साथ फ्रांस में इसका तीखा विरोध शुरू हो गया था. 1986, 1995, 2006 और 2010 में व्यापक पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए और सरकारों को जनता के सामने झुकना पड़ा था.

मैक्रोन की सरकार को भी जन-आक्रोश और जन-विद्रोह के सामने झुकना पड़ा. ईंधन पर टैक्स को वापस लेना पड़ा, वेतन में वृद्धि की घोषणा करनी पड़ी और पेंशन में कटौती के प्रस्ताव को वापस लेना पड़ा है, लेकिन विद्रोही इससे संतुष्ट नहीं हैं, उन्होंने अपनी मागों की एक लंबी सूची पेश की है. व्यापक जन के हितों की पूर्ति करने वाली इस सूची और नव-उदारवादी पूंजीवादी जरूरतों के बीच कोई तालमेल संभव नहीं दिख रहा है. यह स्थिति निरंतर असंतोष, आक्रोश और जन-विद्रोह को जन्म देगी.

डॉक्टर रामू सिद्धार्थ फारवर्ड प्रेस (हिंदी) के संपादक हैं.