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गढ़ बचाने की जद्दोजहद में बीजेपी

BJP strategy and condition in Madhya Pradesh Election

 

मध्यप्रदेश में 28 को मतदान होना है. बीजेपी चौथी बार सरकार बनाने के लिए पूरी ताकत लगा दी है. प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी और बीजेपी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह के साथ शीर्ष नेतृत्‍व प्रदेश में लगातार सभाएं कर रहा है. कांग्रेस पर तीखे हमले किए जा रहे हैं. प्रचार से अलग कमरा बैठकों में अंतिम समय की रणनीति बना ली गई है. बीजेपी की बढ़ी चिंता अपने वर्चस्‍व वाले इलाके मालवा में सीट बचाने की है. कांटे के मुकाबले में तब्‍दील हो चुके इस चुनाव में अपने गढ़ बचाने के लिए बीजेपी संघ की शरण में जा पहुंची है.

मध्यप्रदेश में पुराने परम्परागत रुझानों को देखा जाए तो विंध्य, बुंदेलखंड और महाकौशल कांग्रेस के गढ़ रहे हैं. वहीं निमाड़, मालवा और चम्‍बल सहित मध्यभारत में बीजेपी की पकड़ मजबूत रही है. कांग्रेस की अपने क्षेत्र में बढ़ती ताकत को देख बीजेपी के लिए अनिवार्य हो गया है कि वह मध्यभारत, मालवा, निमाड़ में अपनी सीटों को बचाए रखे. मालवा-निमाड व ग्वालियर-चंबल संभाग को मिलाकर होल्कर और सिंधिया राजघराने के अधीन आने वाले जिस इलाके को मध्यभारत के नाम से जाना जाता है उस इलाके में कांग्रेस की तुलना में कुछ अपवादों को छोड़कर बीजेपी और उसके पूर्व घटक जनसंघ की जमीन मजबूत रही है. पिछले दो साल के भीतर जिस प्रकार का घटनाक्रम हुआ है उससे बीजेपी सरकार के प्रति असंतोष बढ़ा है और किसानों में भी असंतोष उभरा है. कांग्रेस इस इलाके में इस असंतोष को और हवा देकर बीजेपी के किले में सेंध लगाने की पूरी-पूरी कोशिश कर रही है.

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2013 के चुनावी परिणाम के अनुसार मालवा के इंदौर संभाग में अलीराजपुर जिले की दोनों सीटों पर बीजेपी का कब्जा है और कांग्रेस के पास एक भी सीट नहीं है, इसलिए यदि वह अपना यहां आधार बढ़ाती है तो बीजेपी को नुकसान हो सकता है. इंदौर जिले में बीजेपी के पास आठ और कांग्रेस के पास एक सीट है, वह भी इकलौती जीतू पटवारी की, जिनके भरोसे कांग्रेस ने इंदौर और आसपास के इलाकों में कांग्रेस का आधार बढ़ाने की उम्मीद रखते हुए उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था.

खंडवा ऐसा जिला है जहां कांग्रेस के पास कोई विधायक नहीं है और यही स्थिति खंडवा जिले से अलग होकर बने बुरहानपुर जिले की है. इन दोनों जिलों की छह सीटों में से कांग्रेस के पास एक भी सीट नहीं है और सभी पर बीजेपी का कब्जा है.

झाबुआ में दो बीजेपी और एक निर्दलीय विधायक हैं लेकिन झाबुआ और अलीराजपुर में हुए लोकसभा उपचुनाव में यहां कांग्रेस को सभी विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी.  खरगोन में बीजेपी और कांग्रेस के पास आधी-आधी सीटें हैं और दोनों के तीन-तीन विधायक हैं. इससे अलग होकर बने बड़वानी जिले की कहानी भी कुछ ऐसी ही है जहां दो बीजेपी और दो कांग्रेस के विधायक हैं. खरगोन और बड़वानी में असली कांटेदार मुकाबला होने की संभावना है, क्योंकि दोनों ही दल अपनी-अपनी सीटें बचाने के साथ दूसरे से सीटें छीनने में पूरी ताकत लगायेंगे. धार जिले में बीजेपी के पास पांच और कांग्रेस के पास दो विधायक हैं.

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उज्जैन संभाग में बीजेपी की इस समय सबसे मजबूत पकड़ है और यही वह इलाका है जहां से एक-दो जिलों को छोड़कर सरकार के प्रति असंतोष की खबरें भी आती रही हैं. कांग्रेस के पास केवल एक सीट है इसलिए उसके पास यहां खोने के लिए कुछ नहीं है लेकिन पाने की अनन्त संभावनाएं हैं, क्योंकि वह जितनी सीटें जीतेगी उतना बीजेपी को नुकसान होगा. केवल मंदसौर जिले में कांग्रेस का एक विधायक है.

बीते पांच साल में क्षेत्र का माहौल काफी बदल गया है. पार्टी का बूथ स्तर का कार्यकर्ता पार्टी में अपनी उपेक्षा के चलते नाराज चल रहा है तो दूसरी ओर पार्टी को पिछले तीन चुनावों में इस बार सबसे बड़ी संख्या में बागियों का सामना करना पड़ रहा है. पार्टी ने अपने कैडर को सक्रिय करने के लिए कार्यकर्ता महाकुंभ और कार्यकर्ता सम्मेलन सहित अन्‍य आयोजन किए लेकिन कार्यकर्ताओं का सक्रिय न होना पार्टी के बड़े नेताओं में घबराहट पैदा कर रहा है. यही कारण है कि संघ के स्‍वयंसेवकों को सक्रिय कर उनके प्रभाव का उपयोग किया जा रहा है.

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बूथ पर संघ के कार्यकर्ता सक्रिय नजर आने लगे हैं और वे सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था (सपाक्‍स) की ओर से चलाए गए आरक्षण विरोधी अभियान सहित बीजेपी के प्रति नाराजी को दूर करने के उपाय कर रहे हैं. संदेश यही है कि अपनी नाराजगी के कारण सत्‍ता दांव पर नहीं लगाना है. बीजेपी को सबसे अधिक नुकसान मालवा में होने की संघ की पूर्व चेतावनी के अनुसार अब पार्टी चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में अपना गढ़ बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है.