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और स्याह होती गई वो अंधेरी सुरंग

tenure of special judge in babri demolition case extended

 

बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने के 26 साल और मोदी सरकार के लगभग पूरे होने तक भारतीय राजनीति ने एक पूरा दौर देख लिया है. यह दौर है भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता, धार्मिक कट्टरवाद और प्रतिगामी शक्तियों के उत्थान, उभार और उसके सत्ता में काबिज हो जाने का. इस मौके पर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारतीय राजनीति के अंदर की इन प्रवृत्तियों ने अपनी अंतिम परिणीति प्राप्त कर ली है या भारतीय लोकतंत्र में अभी और भी ऐसी प्रवृत्तियों का विकसित होना बचा हुआ है जो इसकी संकल्पनाओं को पूरी तरह से धवस्त कर देने वाला है.

इसे लेकर किन्हीं भी तरह की संभावनाएं तो फिलहाल भविष्य की गर्भ में छुपी हुई हैं, लेकिन 6 दिसंबर 1992 के दिन जो पृष्ठभूमि तैयार की गई थी या यूं कहें कि इससे भी पहले 22 नवंबर 1949 की उस रात को जब बाबरी मस्जिद में राम की मूर्ति स्थापित कर जो पटकथा लिखी गई थी, वो मई 2014 में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार आने के साथ एक हद तक अपने क्लाइमेक्स तक तो जरूर पहुंच गई है.

बाबरी मस्जिद तोड़े जाने की दुर्घटना के कई राजनीतिक-सामाजिक प्रभाव भी देखने को मिले हैं. जिसका लाभ प्रतिगामी शक्तियां बखूबी उठा रही हैं. लेकिन मोदी सरकार के साढ़े चार सालों में मॉब लिंचिंग के आड़ में शुरू हुई राजनीतिक हिंसा की परिपाटी से यह बात पूरी तरह से साफ हो चुकी है कि हिंदूवादी संगठनों की ओर से शुरू की गई इस व्यापक परियोजना के कई अध्याय अभी और भी खुलने बाकी हैं.

हिंदू राष्ट्र के लक्ष्य को लेकर तैयार की गई इस व्यापक परियोजना के दो अहम हिस्से और भी हैं जो बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने से पहले अंजाम दिए गए थे. लेकिन ये दोनों ही घटनाएं बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की पृष्ठभूमि में अहम भूमिका निभाती हैं. इसमें पहला है 30 जनवरी 1948 को हुई महात्मा गांधी की हत्या और दूसरा है 22 दिसंबर 1949 की रात बाबरी मस्जिद के विवादित भाग में राम की मूर्ति स्थापित करना. महात्मा गांधी की हत्या एक सोची-समझी व्यापक रणनीति का हिस्सा थी. जवाहर
लाल नेहरू को इस बात को लेकर पक्का यकीन था. वो हमेशा इस बात को मानते रहे कि महात्मा गांधी की हत्या हिंदू राष्ट्र की मांग करने वाले संगठनों की उस व्यापक साजिश का नतीजा थी, जिसके तहत वो हिंसा और नफरत का माहौल बनाकर भारत की सत्ता पर काबिज होना चाहते थे.

गांधीजी की हत्या के छह दिन बाद नेहरू ने 5 फरवरी 1948 को सभी रियासतों के मुखियाओं को एक खत लिखा था. इस खत में उन्होंने लिखा था, “जांच चल रही है. लेकिन ये जरूर साफ हो चुका है कि इस हत्या के पीछे सिर्फ किसी व्यक्ति विशेष या किसी छोटे समूह का हाथ नहीं है. यह स्पष्ट है कि उसके पीछे (गोडसे के) किसी व्यापक संगठन और नफरत और हिंसा की लंबे समय तक चलने वाली सोची-समझी प्रौपेगेंडा रणनीति का हाथ है. गांधीजी की हत्या के अलावा जो सबसे चिंताजनक बात है वो यह है कि इस देश में ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस पद्धति को अपनाया हुआ है.”

यहां नेहरू सांप्रदायिक शक्तियों की ओर से मिलने वाले ख़तरे को लेकर पूरी तरह से सतर्क दिखते हैं तो इसके विपरीत उस समय के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल का मानना था कि महात्मा गांधी की हत्या हिंदू महासभा के एक कट्टर गुट का काम था, जिसका नेतृत्व वीडी सावरकर के हाथों में था और ये कोई व्यापक साजिश का हिस्सा नहीं थी. 27 फरवरी 1948 को नेहरू को लिखे खत में पटेल कहते हैं, “मैंने लगभग हर रोज बापू की हत्या की जांच में हुई प्रगति पर नज़र बनाए रखा है. शाम को ज्यादातर वक्त मैं संजीवी (इंटेलीजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर) के साथ इस मामले में हुई प्रगति और उन्हें किसी संबंधित बिंदु पर निर्देश देते हुए बिताता हूं. सभी मुख्य आरोपियों ने अपनी गतिविधियों को लेकर विस्तार से बयान दिए हैं. यह सावरकर के नेतृत्व में काम करने वाला हिंदू महासभा का एक कट्टरवादी धड़ा है, जिसने साजिश रची थी. ऐसा भी मालूम होता है कि यह षड्यंत्र मुश्किल से दस लोगों ने मिलकर रचा था. जिसमें से दो को छोड़कर सभी पकड़े गए हैं.”

महात्मा गांधी की हत्या कैसे एक गहरी व्यापक साजिश का हिस्सा थी, इस बात की तस्दीक 22 दिसंबर 1949 की रात को होती है. यह वही रात है जिस रात के अंधेरे में चुपके से राम की मूर्ति बाबरी मस्जिद के विवादित हिस्से में स्थापित कर दी जाती है. इस बारे में कृष्णा झा और धीरेंद्र झा ने अपनी किताब Ayodhya : The Dark Night में विस्तार से बताया है कि गांधी की हत्या और राम मंदिर विवाद की शुरुआत कैसे एक-दूसरे के साथ जुड़ी हुई है और एक ही षड्यंत्र के दो हिस्से हैं. यह महज इत्तेफाक नहीं कि गांधी की हत्या का षड्यंत्र रचने वाले मुख्य अभियुक्त वही लोग थे जिन लोगों ने बाबरी मस्जिद के विवादित भाग में राम की मूर्ति स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाई थी. इन दोनों ही मामलों में षड्यंत्रकारी हिंदू महासभा के एक ही लोग थे.

कृष्णा झा और धीरेंद्र झा अपनी किताब में बताते हैं कि बाबरी मस्जिद में राम की मूर्ति स्थापित करने का मकसद था कि हिंदुओं को बड़े पैमाने पर उकसाकर कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक लाभ लेना. इस किताब के मुताबिक महात्मा गांधी की हत्या और राम मूर्ति की स्थापना के लिए खास वजह से सोच समझकर दिन का अलग-अलग पहर चुना गया था. महात्मा गांधी की हत्या दिन-दहाड़े भरी भीड़ के सामने की गई थी तो बाबरी मस्जिद में राम की मूर्ति रात के सन्नाटे में चोरी-चुपके रखी गई. इसका कारण यह था कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद हिंदू महासभा के लोगों ने सबक लिया कि सरकार से सीधे तौर पर टकराहट से बचना है ताकि इसका भरपूर राजनीतिक लाभ उठाया जा सके.

महात्मा गांधी की हत्या के बाद 24 दिसंबर 1949 को पहली बार हिंदू महासभा का अधिवेशन कलकत्ता में होने जा रहा था. यह हिंदू महासभा का 28वां अधिवेशन था. इस अधिवेशन का उद्घाटन महात्मा गांधी की हत्या के आरोप में एक साल के बाद छूटकर आए वीडी सावरकर करने जा रहे थे. बॉम्बे से कलकत्ता जाने के दौरान नागपुर स्टेशन पर थोड़ी देर के लिए ट्रेन रूकने वाली थी और वहां उपस्थित महासभा के लोगों को सावरकर संबोधित करने वाले थे. यह बाबरी में राम मूर्ति स्थापित होने के बाद का दिन था. वहां उपस्थित भीड़ को संबोधित करते हुए सावरकर ने कहा था, “अखंड भारत के हम अपने लक्ष्य में पहले से कहीं और नजदीक पहुंच चुके हैं. दो सालों की कड़ी मेहनत और कष्टों को झेलने के बाद हम अपने सिद्धांतों को लेकर और प्रतिबद्ध हुए हैं. जहां व्यापक पैमाने पर हिंदू रहते हों वहां धर्मनिरपेक्ष राज्य की बात करना बेतुकी बात है और हिंदू राष्ट्र की स्थापना करना उनका कर्तव्य है.”

हालांकि हिंदू महासभा को उस वक्त उनकी सोच के मुताबिक सफलता तो नहीं मिली लेकिन बाद के सालों में रामजन्म भूमि विवाद और फिर इस विवाद की आड़ में बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने ने जरूर हिंदूवादी संगठनों को राजनीतिक लाभ पहुंचाया और भारत की राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित किया. रामजन्म भूमि विवाद का मामला फिलहाल भले ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, लेकिन इतना तो तय है कि आज़ादी के वक्त से हिंदू-मुस्लिम के बीच पैदा हुई विश्वास की खाई बाबरी मस्जिद विवाद से उस अंधेरी सुरंग में जा चुकी है जिसका कोई अंत नहीं दिखता.